'फुटकल रचना'

         
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अभी-अभी मौसम का मिजाज बदला है,
अभी-अभी उनका भी अंदाज बदला है
जिनके लिए हम खामोश रहे उम्र भर,
कम्बखत उसी ने आज नया सरताज बदला हैं

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ज़माने ने चलाई थी नुकीली तीर मेरे दिल पर 
ओ तो संयोग अच्छा था कि दिल को चोर ले भागा
                
               3 

हजारो मंजिलें भी हैं हजारो कारवां भी हैं,
निगाहें आज भी तपती हैं महलों में देख कर रोटी।

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देख तिरंगा हाथ उनके, रूह में अवसाद होगा
आज फिर से रोयेंगी , कब्र की कुछ हड्डियां

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उस रोज गर तुम हमे मिल गये होते
जन्नत में आज हमारी भी अर्जी लगी होती 
   
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वह सितारा खास था , जिसको मैनें खो दिया.
क्या करूँ इस चाँद का जिसमें हजारो दाग हैं

        

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