सनसनीखेज न्यूज़ की राजनीति

मकालीन परिदृश्य में हमारे जीवन के प्रत्येक छड़ में मीडिया का हस्तक्षेप बढ़ता जा रहा है। जिसके अनेक कारण हैं। मीडिया के विभिन्न जनसंचार माध्यमों ने हमें सनसनीखेज ख़बरों का आदी बना दिया है। इतिहास, कला, संस्कृति, राजनीतिक घटना आदि सभी क्षेत्र में सनसनीखेज खबरों का ही बोलबाला है। इन खबरों के माध्यम से जनता के दिलों-दिमाग पर जोरदार हमला किया जाता है। इस हमले में अधिकाधिक सूचनाएं ऐसी होती हैं जो बाजार का विज्ञापन कर सकें। यह मीडिया का सांस्कृतिक बाजारवाद है, जो शोर के साथ अप्रासंगिक को भी प्रासंगिक बनाकर प्रस्तुत करने में लगा है। आज की मीडिया जनता को संप्रेषित ही नहीं कर रहा बल्कि भ्रमित भी कर रहा है। भूमंडलीकरण के इस युग में मीडिया का उद्देश्य बाजार को प्रोत्साहित करके पूंजीपतियों के लिए अधिकाधिक लाभ का द्वार खोलना है। इसके अनेक खतरे हैं। अगर ऐसे ही चलता रहा तो हमारी सभ्यता और संस्कृति, भाषा और साहित्य, नदियाँ, जंगल और पहाड़ का अस्तित्व मिट जायेगा और हम आभासी दुनिया का ढोल पीटने के लिए मजबूर होंगे। अभी हाल ही में घटी राजनैतिक और सामाजिक घटनाओं के अध्ययन और विश्लेषण के बाद यह बात और प्रमाणिक तौर पर कही जा सकती है
 आज सरकार और मीडिया का हस्तक्षेप आपके व्यक्तिगत जीवन को गहरे से प्रभावित कर रहा है। यह एक ऐसा समय है, जिसमें आपको आपके द्वारा किये गए हर गतिविधि का स्पष्टीकरण देना पड़ रहा है। जैसा कि जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय की घटना के बाद देशभक्त और देशद्रोही का, भारत माता की जय बोलने वाले और न वाले, का मुद्दा बनाकर मानवता के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। यह अनायास नहीं है, इसके पीछे एक गहरी और सोची-समझी चाल है। पिछले कुछ समय का अगर आप गहन अध्ययन करेंगे तो आपको सहज ही समझ में आ जायेगा कि यह किस प्रकार की राजनीति का गन्दा खेल खेला जा रहा है। दरअसल यह ‘मुद्दा-विस्थापन’ का खेल है। इसमें आप किसी एक मुद्दे पर गहन चिंतन और विमर्श कर ही नहीं सकते, यह स्वभाविक नहीं है आपके न चाहते हुए भी आप से करवा लिया जाता है। जिसमे मीडिया की अहम् भूमिका है। जो आपको हर समय सनसनीखेज होने के लिए मीठे जहर का डोज दे रहा है। इसको आप इस तरह से देख सकते हैं कि जबसे यह नयी सरकार बनी है आपने कितनी गहनता से साहित्य, कला और सिनेमा को पढ़ा और देखा है। मैं पुरे विस्वास के साथ कह सकता हूँ कि आपका ग्राफ गिरा है।        

जगदीश्वर चतुर्वेदी से कुछ शब्द उधार लेते हुए यह कहना चाहूँगा कि- भूमंडलीकरण के इस युग में पूंजीवादी कम्पनियां अपने साम्राज्य विस्तार के लिए मीडिया में ज्यादा से ज्यादा निवेश करके मीडिया एवं सूचना तकनीकी का पूरा लाभ उठा रहीं हैं। खासकर पसंदीदा सरकार के गठन में गहरी दिलचस्पी लेकर राजनीतिक तनाव और टकराव के क्षेत्र में शासकवर्गों के साथ मिलकर हस्तक्षेप करना इनकी नियति बनती जा रही है। भूमंडलीकरण और बहुराष्‍ट्रीय मीडिया की युगलबंदी; स्थानीय, क्षेत्रीय और ग्लोबल अभिरूचियों, संस्कारों और संस्कृति के बीच सामंजस्य का काम कर रही है। मीडिया में इससे संबंधित इमेजों, प्रतीकों, मालों और लोगो का प्रसारण बढ़ा है। पावर का खेल फैला है। पावर के इस खेल के कारण नव साम्राज्यवाद का विस्तार हुआ है जो पूंजी पर आधारित है। पूंजी के इस विनिमय ने बाजार का निर्माण किया है, और बाजार, मीडिया तथा संस्कृति दोनों को प्रभावित कर रहा है। इस प्रकार यह आपकी सामुदायिकता को तोड़ने का प्रयास है। जिसमे वो काफी हद तक कामयाब भी हो रहे हैं। लेकिन साहित्य, कला और संस्कृति का सबसे बड़ा गुण यह है कि यह आपको भ्रमित होने और टूटने से बचाती है। यही इसकी शक्ति है, जो हर काल और समय में इसने अपने आपको आगे करके मानवता को बचाती आयी है, और आज भी इससे हमें यही उम्मीद और अपेक्षा है। 

टिप्पणियाँ