* महेश सिंह
हिंदी साहित्य को साहित्य के
इतिहासकारों द्वारा मुख्यतः आदिकाल, भक्तिकाल, रीतिकाल, और आधुनिककाल के नाम से
चार कालखंडो में विभाजित किया गया है। सभी कालखंडों के भी अपने-अपने प्रवृतिगत विभाजन हैं। इन प्रवृतिगत विभाजनों
में पुरुष रचनाकारों के अलावा महिला रचनाकारों की उपस्थिति कम ही सही, किन्तु; मुख्यधारा
में मिलती है। लेकिन आधुनिककाल के भारतेंदु युग में ‘जिसे नवजागरण काल के साथ-साथ
हिंदी साहित्य के अन्य गद्य विधाओं के उद्भव का युग भी कहा जाता है’ महिला रचनाकारों का न मिलना
हिंदी-नवजागरण जैसे आन्दोलनकारी और प्रगतिशील शब्द पर प्रश्नवाचक चिन्ह लगाना स्वभाविक
सा जान पड़ता है। इस युग से सम्बंधित साहित्यक सामग्री की काफी जाँच-पड़ताल के बाद
डॉ. भवदेव पांडेय, डॉ. धर्मवीर, जगदीश्वर चतुर्वेदी और वीर भारत तलवार के शोध-परक
पुस्तकों के माध्यम से कई महिला रचनाकारों का नाम उभरकर सामने आया है। जिनमे ‘एक अज्ञात
हिन्दू महिला’, ‘सरस्वती गुप्ता’, प्रियंवदा देवी, हेमंत कुमारी चौधरी, यशोदा
देवी, ब्रह्मा कुमारी दूबे, रुक्मणी देवी, हुक्म देवी गुप्ता, लीलावती देवी और बंग
महिला जैसी लेखिकाएँ हैं।
इन महिला रचनाकारों में से ‘एक अज्ञात हिन्दू
महिला’ और बंग महिला ही ऐसी रचनाकार हैं जिनकी रचनाएँ क्रमशः ‘सीमान्तनी उपदेश’ और
हिंदी साहित्य की पहली कहानी के रूप में ‘दुलाईवाली’ मुख्य रूप से अपनी पहचान
बनाने में सफल हो पाई हैं। इनके अलावा कोई भी महिला रचनाकार ऐसा नहीं है जो हिंदी
साहित्य के क्षितिज पर अपनी उपस्तिथि दर्ज करा पाया हो। हालाकि सरस्वती गुप्ता का
उपन्यास ‘राजकुमार’(१८९८); साध्वी सती पति प्राणा अबला का उपन्यास
‘सुहासिनीं’(१८९०); प्रियंवदा देवी का ‘लक्ष्मी’, हेमंत कुमारी चौधरी का
‘आदर्शमाता’ और यशोदा देवी का ‘वीर पत्नी’ नामक कृतियाँ इसी युग में छपीं; लेकिन
इनको उतनी पहचान नहीं मिल पाई जितना मिलना चाहिए था। इन सभी उपन्यासों के केंद्र
में स्त्री की गरिमा, मान-मर्यादा और अस्मिता के प्रश्न हैं। इनमें वे प्रश्न भी
हैं जो तद्युगीन सामाजिक, धार्मिक सुधार अन्दोलोनों ने उठाये थे। इन सभी प्रश्नों
के होते हुए भी इन कृतियों का हिंदी साहित्य में नामों-निशान न मिलना
भारतेन्दुकालीन स्त्रियों के प्रति पुरुष की मानसिकता को दर्शाता है।
‘सीमान्तनी
उपदेश’ देवनागरी लिपि में सबसे पहले १ फरवरी१८८२ को छापी गई थी। इस पुस्तक की
लेखिका का नाम अज्ञात है। इसे मुंशी कन्हैया लाल अलखधारी ने प्रकाशित कराया था।
लेखिका ने अपना नाम जानबूझ कर छिपाया है। इस प्रकार इस पुस्तक की लेखिका ‘एक
अज्ञात हिन्दू महिला’ के नाम से जानी जाती हैं। इस पुस्तक का सम्पादन करते हुए डॉ.
धरमवीर ने कहा है कि- “सीमान्तनी उपदेश’ से पता चलता है कि यह पुस्तक पहली बार १
फरवरी, १८८२ को मुंशी कन्हैया लाल अलखधारी ने लुधियाने से छापी थी”[1] सीमान्तनी
उपदेश अपने आप में अनूठी पुस्तक है। इसकी लेखिका ने तद्युगीन समाज का गहन अध्ययन
करते हुए वैचारिक स्तर पर समाज-दर्शन का बड़ा गंभीर चिंतन किया है। वे उस समय की
अन्य महिला रचनाकारों से कई मामलों में अलग दीखती हैं। जहाँ अन्य महिला रचनाकार
तत्कालीन पुरुष समाज की हाँ में हाँ मिलाती हुई चलती हैं वहीँ इस लेखिका ने
क्रांतिकारी रूप धारण किया है। ‘जबाब एक औरत का’ में लिखती हैं कि- “ जब परमेश्वर
ने इनको पैदा किया तो सब इन्द्रियां मर्दों के बराबर दीं। यह कुछ बात नहीं कि
खाविंद मर जाये तो सब इन्द्रियां अपना असर छोड़ दें। जबतक देह में दम है ये जरुर
वक्त पर अपना असर करेंगी। ऐसा कोई दुनियां में पैदा नहीं हुआ जिसने इनके फैल को
रोका हो। बड़े-बड़े महात्माओं की इन्द्रियां चलायमान हो गई हैं फिर औरत क्या चीज है
जो रोक सके।[2]
इस प्रकार जो तेवर ‘एक अज्ञात
हिन्दू महिला’ की रचनाओं में देखने को मिलते हैं, वैसा इस युग की किसी भी लेखिका
की रचनाओं नहीं देखा गया। यहाँ तक कि बंग महिला की रचनाओं में भी नहीं। यह अलग बात
है कि बंग महिला हिंदी साहित्य में ‘एक अज्ञात हिन्दू महिला’ से कहीं ज्यादा
प्रसिद्द रहीं। लेकिन इन दोनो महिला लेखिकाओं की रचनादृष्टि और चिंतन में जमीन-
आसमान का अंतर है। उदाहरण स्वरुप हम रामचंद्र शुक्ल द्वारा सम्पादित पुस्तक ‘कुसुम
संग्रह’ में बंग महिला का ‘स्त्रियों की शिक्षा’नामक लेख में देख सकतें हैं- “यदि
लडकियों को और कुछ नहीं तो थोड़ी-सी मातृभाषा की शिक्षा मिल जाया करे तो एक पत्र
लिखने के लिए उनको दूसरों का मुह न ताकना पड़े।[3] बंग
महिला के इस वक्तव्य से ऐसा प्रतीत होता है जैसे वो पुरुष समाज और प्रसाशन से झोली
फैलाकर स्त्री शिक्षा के लिए भीख मांग रही हैं। जबकि ‘सीमंतनी उपदेश’ की लेखिका ने
पुरुष, स्त्री, और प्रसाशन सबके लिए आक्रमक रुख अख्तियार किया है। ‘पतिव्रता धर्म’
में वे लिखती हैं-“प्रीत समान की समान से होती है। इसका तो बेवकूफ को भी तजुर्बा
होगा। देखो, बालक कभी बूढ़े से खुश नहीं रहता हमेशां बालकों में ही खुशी से खेलता
है। जवान कभी बूढी स्त्री से राजी नहीं रहेगा। जवान स्त्री कभी बूढ़े से खुश न
होगी। बस, यह धर्म इस वक्त के वास्ते नहीं है। आजकल की स्त्रियों को विद्या से
महरूम रख, जेलखाने में डाल, तिस पर शक कर, विधवाओं की दूसरी शादी न कर, आप दस-दस
शादियाँ करते हैं। क्या ये बेइंसाफी नहीं इनको इस धर्म की राह बताना? क्या जुल्म
नहीं अंधे को कुएं में धकेल देना? क्या अंधे के बराबर इनकी हालत नहीं है?”[4]
उपर किये गए दोनों महिला लेखिकाओं
की रचनादृष्टि की तुलनात्मक विश्लेषण में मेरा कहीं से भी यह आशय नहीं है कि ‘बंग
महिला’ का योगदान कम है, दरअसल यह केवल शालीनता और आक्रमकता का अंतर है। इस
सम्बन्ध में वीर भारत तलवार के वक्तव्य का जिक्र करना लाजमी होगा- “सीमंतनी उपदेश
और स्त्री-पुरुष तुलना के मुकाबले ‘बंग महिला’ की रचनाओं से स्पष्ट है कि बुनियादी
तौर पर वे स्त्री सम्बन्धी परम्परागत दृष्टिकोण की समर्थक थीं”[5] यही
दृष्टिकोण ‘एक अज्ञात हिन्दू महिला’ से ‘बंग महिला’ को अलग रखता है। इसका एक कारण
यह भी हो सकता है कि दोनों की पारिवारिक पृष्ठभूमि अलग- अलग थी; साथ ही समय काल में
भी लगभग दो -तीन दशक का अन्तराल है। जहाँ ‘बंग महिला’ का परिवार शिक्षित और आर्थिक
रूप से काफी संपन्न था; इसके अलावा वे चार भाइयों के बीच में अकेली बहन थीं; जिससे
आजीवन उन्हें प्यार और दुलार मिलता रहा; वहीँ ‘एक अज्ञात हिन्दू महिला’ के बारे
में अभी तक सब कुछ अज्ञात ही है सिवाय इसके कि वह ‘बाल विधवा’ थीं। अब जिस लेखिका
को अपनी पहचान तक छुपाना पड़ा हो, समाज के प्रति उसके अनुभव का सहज ही अनुमान लगाया
जा सकता है। यहीं पर ‘भोगा हुआ यथार्थ’ प्रासंगिक हो उठता है, जो समकालीन विमर्शों
अर्थात ‘स्त्री विमर्श’, ‘दलित विमर्श’, ‘आदिवासी विमर्श’ इत्यादि का केन्द्रीय बिंदु
है।
“उपेक्षा, अज्ञातवास एवं दमन की
मार इतनी गहरी होती है कि स्त्री अपनी पहचान,अधिकार और निजी सत्ता ही भूल गई या
भुला दी गई। सामाजिक साहित्यिक इतिहास से पुंसवादी इतिहास दृष्टी ने स्त्री को
खदेड़ दिया। यही वजह है कि इतिहास ग्रंथों में स्त्री की सृजनात्मक एवं संघर्षशील
इमेज का उल्लेख तक नहीं मिलता”।[6]
पुंसवादी समाज व्यवस्था भारतीय समाज का एक ऐसा कोढ़ है जो प्राचीन काल से लेकर अभी
तक पुरुष मानस के अतल गहराई में जड़ होकर बैठा हुआ है। यही जड़ हुई पुरुष मानसिकता,
स्त्री को कभी भी अपने समकक्ष आने का अवसर उपलब्ध नहीं कराया। अगर कभी कुछ किया तो
उन्हें देवी बना डाला। इसके पीछे भी उनका अपना निजी स्वार्थ ही जुड़ा था; क्योंकि
देवी की मर्यादा होती है और मर्यादा की सीमा भी। बाकी स्त्री ‘दासी’ रूप में अपना
जीवन जी ही रही थी। दासी, जिसे गुलामी का पर्याय समझा जा सकता है।
भारतेन्दुकालीन महिला रचनाकारों को यदि पुरुषों
का सहीं सहयोग मिला होता तो हिंदी साहित्य की रूप-रेखा अलग होती; क्योंकि प्रत्येक
वर्ग का अपना अलग अनुभव होता है। खैर, जिस प्रकार से भक्ति आन्दोलन का प्रारंभ
महिला रचनाकारों ने किया उसी तरह भारतेंदु युग में उपन्यास विधा के विकास में
स्त्रियों की निर्णायक भूमिका थी। उपर हमने कई महिला उपन्यासकारों का उल्लेख किया
है। उनके उपन्यासों में प्राचीन मर्यादाओं और रिवाजों का ध्यान रखते हुए स्त्री
अस्मिता को उभारने का प्रयास दिखाई देता है। लगभग सभी उपन्यासों में वर्णनात्मक शैली
का प्रयोग हुआ है। संवाद की बजाय वर्णन पर ज्यादा जोर है साथ ही इतिवृतात्मकता और
उपदेशात्मकता ने भी इनका पीछा नहीं छोड़ा है। यथार्थवादी दृष्टिकोण इन उपन्यासों
में देखने को तो नहीं मिलता है लेकिन विचारों की अभिव्यक्ति भरपूर हुई है।
यहाँ पर महत्वपूर्ण यह नहीं है कि
इनके उपन्यासों में ‘औपन्यासिकता’ है या नहीं; महत्वपूर्ण यह है कि उपन्यास के
उद्भव काल में ही स्त्रियों ने ‘उपन्यास’ लिखने का साहस किया; जबकि वे समाज की
मुख्य धारा की नहीं थीं। फिर भी इन “उपन्यासों में पति पत्नी संबंधों की सार्थकता,
संयुक्त परिवार की सार्थकता, स्त्री-शिक्षा की महता, स्त्री-साहस, स्त्रियों के
आपसी सौहाद्रपूर्ण संबंधों, स्त्रियों के त्याग, दान-पुण्य, प्रकृति प्रेम, बाल
विवाह निषेध, पुरषों की अधीनता का विरोध, पाश्चात्य जीवन शैली और भारतीय जीवन शैली
के अंतर्विरोधों, भारतीय जीवन शैली की सार्थकता एवं श्रेष्ठता, मद्यपान निषेध, दुरावस्था
में ईश्वर की प्रार्थना, स्त्री की लोकोपकरिणी छवि, सेविका, पति परायण,
कर्तव्यनिष्ठ बहिन आदि इमेजों का रूपायन मिलता है।[7]
‘साध्वी सती पति प्राणा अबला’ का
उपन्यास ‘सुहासिनीं’ जिसका प्रकाशन १८९० में हुआ था। इस उपन्यास की नायिका ‘सुहासिनीं’
जिसके माता और पिता नहीं है। शादी के बाद भयानक गरीबी का दंश झेलती है। उसे अपना
शहर तक छोड़ना पड़ता है। अकालग्रस्त अवस्था में भिक्षा मांगती है।अंत में एक
ब्राह्मण के यहाँ महराजिन का कार्य करती है। इस प्रकार इस उपन्यास में भूख और आकाल
के खिलाफ संघर्ष का जीवंत चित्र उभर कर सामने आता है।
इसी प्रकार सरस्वती गुप्ता का
उपन्यास ‘राजकुमार’ जो १८९८ में छपा। इसकी
नायिका ‘ज्ञानलता’ जो एक शिल्पी की बेटी है। बुद्धि और विवेक की तीव्रता के बलबूते
उसकी एक राजकुमार के साथ शादी हो जाती है। भविष्य में यही ज्ञान और विवेक राजकुमार
के मन में ज्ञानलता के प्रति ईर्ष्या पैदा कर देता है जिससे वह ज्ञानलता को त्याग
देता है। ज्ञानलता के दो बेटे हैं। बेटों के बड़े होने पर वह राजकुमार से उनके
जरिये अपने अपमान का बदला लेती है। अंत में राजकुमार उससे माफ़ी मागता है।
यशोदा देवी के उपन्यास ‘वीर पत्नी’ की नायिका ‘संयोगिता’ है। दरअसल इसकी कथा
पृथ्वीराज चौहान, जयचंद और संयोगिता की ही है। किन्तु इस उपन्यास में कई परिवर्तन
किये गए हैं जैसे पृथ्वीराज के मित्र चंदबरदाई तथा
कैमास तक का जिक्र उपन्यास में
कहीं भी देखने को नहीं मिलता। इसके अलावा यह दिखाया गया है कि पृथ्वीराज की मृत्यु
हो जाती है। जिसके उपरांत संयोगिता ने मुहम्मद गोरी और जयचंद की सेनाओं हराया।
इस प्रकार इस युग की अनेक अज्ञात
व अल्पज्ञात महिला रचनाकारों ने पुंसवादी समाज की चुनौती को स्वीकार कर रचना
धर्मिता में लगी रही और अपनी अभिव्यक्ति को शब्दों में पिरोया। इसलिए पुरुष
उपन्यासकारों और महिला उपन्यासकारों की दृष्टी में काफी अंतर मिलता है। जगदीश्वर
चतुर्वेदी इस बारे में लिखते हैं – “आरम्भ के स्त्री उपन्यासों में स्त्री की
वास्तविक दशा के यथातथ्य वर्जन पर जोर है। जबकि अनेक पुरुष उपन्यासकारों ने ‘रोमांस’
को मुख्य विषय बनाया था। यथातथ्य वर्णन एवं इतिवृतात्मक शैली के कारण स्त्री की
समस्याओं की तरफ ध्यान खींचना मुख्य लक्ष्य था। इस तरह ये उपन्यास समाज सुधार
आंदोलनों से अपना रिश्ता बना रहे थे। स्त्रियों में यह दृष्टिकोण लोकप्रिय था कि
समाज सुधार संघर्षों के जरिये ही आधुनिक चेतना का निर्माण संभव है । इसे ही
राजनितिक परिवर्तन की कड़ी माना”।[8]
हिंदी साहित्य के आधुनिक काल का यह युग कई
मायने में आधुनिकता लिए हुए इतिहास के पन्नों में दर्ज है। चाहें वह तमाम गद्य
विधाओं के उद्भव काल के रूप में हो, नवजागरण हो, या १८५७ की क्रांति हो। इन सभी में कुछ न कुछ नयापन जरुर दीखता है।
लेकिन स्त्रियों के प्रति भारतीय समाज नजरिया वही का वही है जो मुगलों का था। अभी
तक हुए नये शोध और खोजों के माध्यम से हिंदी साहित्य के इस युग में जितनी महिला
रचनाकारों और उनकी रचनाओं का पता चला है। उनमे से कुछेक को छोड़ कर अधिकतर अहिन्दी
भाषी क्षेत्रों की ही महिलाएं हैं। उदहारण स्वरुप हम ‘बंग महिला’ और ‘एक अज्ञात
हिन्दू महिला’ का नाम ले सकते हैं। बंग
महिला जहाँ बंगाल से हैं वहीँ डॉ. धर्मवीर ने एक अज्ञात हिन्दू महिला का सम्बन्ध
पंजाब से जोड़ कर देखा है। “इसी पंजाब की धरती पर ‘सीमंतनी उपदेश’ की इस अज्ञात
लेखिका ने उन्नीसवीं शताब्दी में काम किया था”।[9]
अंततः
यही कहा जा सकता है कि भारतीय दृष्टी से स्त्री विमर्श के उद्भव को तलाश कर स्त्री
के योगदान का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य देखने की आवश्यकता है।
अब खोल आखें
अपनी दुनियां को देखो तुम,
लाखो
तुम्हारी हजों में पुस्तक है छप चुकीं ।
शोधार्थी, हिंदी विभाग, विभाग,
पांडिचेरी यूनिवर्सिटी, पुदुचेरी-६०५०१४
मोब. ७५९८६४३२५८ Email – gguhindi@gmail.com
[1] सीमान्तनी उपदेश, संपा. डॉ. धरमवीर, वाणी प्रकाशन, नयी
दिल्ली, द्वितीय संस्करण २००८, पृष्ठ-१८
[2] वही, पृष्ठ- ७१
[3] बंग महिला: नारी मुक्ति का संघर्ष, भवदेव पाण्डेय, वाणी
प्रकाशन, नयी दिल्ली, द्वितीय संस्करण,२००८ पृष्ठ- ११
[4] सीमंतनी उपदेश, संपादक- डॉ. धर्मवीर, वाणी प्रकाशन, नयी
दिल्ली, द्वितीय संस्करण,२००८ पृष्ठ- १०७
[5] रस्साकशी, वीर भारत तलवार, सारांश प्रकाशन दिल्ली, २०१२
पृष्ठ-२१८
[6] स्त्रीवादी साहित्य विमर्श, जगदीश्वर चतुर्वेदी, अनामिका
पब्लिशर्स, नई-दिल्ली,२०११ पृष्ठ-११८
[7] वही, पृष्ठ-१२०
[8] वही, पृष्ठ-१२२, १२३
[9] सीमंतनी उपदेश, संपादक- डॉ. धर्मवीर, वाणी प्रकाशन, नयी
दिल्ली, द्वितीय संस्करण,२००८ पृष्ठ-२१
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