महेश सिंह
आज चारो तरफ झूठ, कपट और भ्रष्टाचार का माहौल ऐसे फैला है जैसे
नैतिकता तो मानो मुर्खता का पर्याय है। जो नैतिकता की शेखी बघारता है परिहास का पात्र
माना जाता है। नैतिकता जैसी आदर्श मूल्य को लेकर बड़ा विरोधाभास देखने को मिलता है।
नैतिक जीवन मूल्यों की चाहत सभी को है किन्तु इन्हें व्यवहार में लाना कोई नहीं
चाहता। हम कैसे भी हों किन्तु हमारे आस –पास की दुनिया तो हमें शांत और सुखद ही
चाहिए। भले ही कर्तव्य मित्र निभाएं, बलिदान पडोसी दे। हम सभी अनजाने ही सही इस
स्वार्थ से ग्रसित हैं। इस प्रकार यह सवाल उठाना स्वभाविक हो जाता है कि क्या हमें
जीवन के नैतिक मूल्यों का समूल रूप से परित्याग कर आवश्यकता अनुसार सुविधाभोगी
जीवन मूल्य अपना लेने चाहिए ? यदि आज के दौर में नैतिक मूल्यों की प्रासंगिकता त्वरित
लाभकारी नही है तो क्या यह माना जाना चाहिए कि इनकी कोई सार्थकता नहीं रह गई है ?
इस प्रकार यदि इन प्रश्नों का उत्तर ‘हाँ’ है तो इस बहस में पड़ने का कोई औचित्य
नहीं है और यदि इन प्रश्नों का उत्तर ‘नही’ है तो एक और प्रश्न उठाना स्वाभाविक है
कि- आखिर क्या करना चाहिए ? इसी क्या करना चाहिए का जवाब बोध- कथाएं देती हैं।
क्योंकि बोध-कथाओं में नैतिकता, शिक्षा, आदर्श और उपदेस आदि की प्रधानता होती है
अत: वे शिक्षक या उपदेशक का काम करती हैं या यूँ कहना चाहिए कि बोध-कथाएं जीवन को
मार्ग दिखने का काम करती हैं। किन्तु आज के समकालीन परिदृश्य का यथार्थ यही है कि
बोध-कथाएं साहित्य की दुनियां में हाशिये पर हैं।
आदर्श मूल्यों द्वारा ही सामाजिक सुव्यवस्था का निर्माण
होता है। इन आदर्श मूल्यों में नैतिक मूल्य की आज सबसे ज्यादा आवश्यकता है। आज के
इस भूमंडलीय परिवेश में सर्वाधिक ज्वलंत समस्या नैतिक मूल्य संकट ही है। वैज्ञानिक
प्रगति, प्रौद्योगिक विकास और अर्थ प्रधानता के कारण उसपर अनेक प्रश्न खड़े हो गए
हैं। हर व्यक्ति कुंठा अवसाद और हतासा में जीने के लिया मजबूर हो रहा है। इसके लिए
हमें अपना चिंतन बदलना होगा, पुराने किन्तु उन शाश्वत मूल्यों को जीवन में फिर से
स्थापित करना होगा लेकिन आँख मुंदकर नहीं। क्योंकि समय के साथ आदर्श मूल्यों की
रूढ़ता को तोड़ने की भी आवश्यकता है। आज के इस भौतिक युग में नैतिक मूल्यों का ह्रास
हुआ है और शायद यही एक कारण है कि बोध-कथाएं साहित्य की मुख्य धारा से दूर हैं ।
हालाँकि यह भी एक सत्य है कि समकालीन समय की बोध-कथाओं के स्वरूप में काफी कुछ
फेर-बदल हुआ है और आगे भी आने वाले समय में इसकी गुंजाइश बनती दीख रही है।
यहां पर बोध-कथा और लघु-कथा के अंतर्संबंध का स्पष्टीकरण कर
लेना अस्वभाविक न होगा । बोध-कथा और लघु कथा में काफी अंतर होता है। बोध-कथाएं
जहाँ शिक्षक या उपदेशक का काम करती हैं वहीँ लघु-कथा इन प्रयोजनों से दूर है । अब
बात यह है कि लघु-कथाओं का आरंभिक स्वरुप क्या था ? क्या लघु-कथाएं बोध-कथाओं का
क्रमिक विकास हैं ? इसके जवाब में मैं यही कहना चाहूँगा कि बोध कथाओं का क्रमिक
विकास ही लघु-कथाएं हैं । जिनके स्वरूप में काफी बदलाव आया है और इस बदलाव को इस
रूप में देखा जाना चाहिए कि बोध-कथाएं उपदेश देती हैं और लघु-कथाएं प्रश्न पूछती हैं
और व्यवस्था के विकृत रूप से परिचय कराकर उसे सही करने के प्रति व्यक्ति को कुछ
सोचने हेतु बाध्य करती हैं । लेकिन बोध-कथाओं और लघु-कथाओं का अंतिम उद्देश्य
आदर्श की स्थापना ही है । इस दृष्टि से बोध-कथाओं के बदलते स्वरूप के रूप में
लघु-कथाओं को देखा जाना चाहिये और समकालीन लघु-कथाओं को भी बोध कथा ही समझना चाहिए
। इस प्रकार बोध-कथाओं के समकालीन
परिदृश्य में लघु-कथाओं को भी रखा जा सकता है ।
यशपाल जैन ने अपनी एक बोधकथा संग्रह की भूमिका में लिखा है
– “मुझे हर्ष है कि भारत सरकार के प्रकाशन विभाग द्वारा मेरी कुछ चुनी हुई लघु
कथाओं का यह सग्रह प्रकाशित हो रहा है । इन कथाओं के विषय में मेंरा कुछ कहना
आवश्यक नहीं है । अपनी बात ये कथाए स्वयं कहती है । फिर भी मैं दो-एक बातों की ओर
पाठकों का ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं । पहली बात तो यह है कि इन कथाओं का किसी
भी धर्म,
विश्वास अथवा जातपात से कोई संबंध नहीं है । उनका पटल
व्यापक है। उनमें अच्छा मनुष्य बनने की प्रेरणा है। ये उन भावनाओं को बढावा देती
है,
जो इन्सान को इन्सान से जोड़ती हैं और उनके बीच प्रेम तथा
आत्मीयता का रिश्ता विकसित करती है । दूसरी बात यह है कि इनके पढ़ने में अधिक समय
नहीं लगता है,
लेकिन प्रत्येक कथा को पढ़ने के बाद पाठक को उन मूल्यों के
विषय में सोचने को विवश होना पड़ता है, जो मानव-जीवन की बुनियाद है। कहा जा सकता है कि ये कथाएं जाने-अनजाने उस एकता
को साधित करती हैं,
जिसकी आज बड़ी आवश्यकता है। लघु कथाओं का चलन नया नहीं है वे
युगों से चली आ रही है,
आगे भी चलती रहेंगी, वास्तव में ये कथाएं उन बातों को आसानी से कह देती हैं, जिन्हें बड़े-बड़े पोथे भी नही कह पाते। ये कथाएं सबके काम की
हैं । जो भी इन्हे पढेंगे,
उन्हें लाभ ही होगा” ।
यशपाल जैन के इस वक्तव्य के बाद मैं यहाँ पर दो बातों का
जिक्र करना चाहता हूँ । पहला यह कि लघु-कथायें इन्सान को इन्सान से जोडती हैं और
उनके बीच प्रेम तथा आत्मीयता का रिश्ता विकसित करती है । दूसरा यह कि लघु-कथाओं का
चलन नया नहीं है, वे युगों से चली आ रही है, आगे भी चलती रहेंगी । इस प्रकार यह सिद्ध होता है कि लघु-कथाएं
अंततः आदर्श नैतिक मूल्यों की बात करती हैं और बोध-कथाएं भी । इसके अलावा इसकी परंपरा
पुरानी है । इन दोनो कथा-विधाओं की साम्यता को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि बोध-कथाओं
का क्रमिक विकास ही लघु-कथाएं हैं ।
अब बात करते हैं बोध कथाओं के समकालीन परिदृश्य के बारे में
। यहाँ पर स्पस्ट कर देना आवश्यक है कि मैं बोध-कथा को लघु-कथा के रूप में ही
देखने का प्रयास कर रहा हूँ । बहरहाल समकालीन समय में बहुतायत लघु-कथाएं लिखी जा
रही हैं, और मेरा अनुमान है कि साहित्य की अन्य विधाओं से ज्यादा पाठक वर्ग
लघु-कथाओं का है । लेकिन लेखकों की संख्या बहुत कम है क्योंकि हिंदी के लघु-कथा
लेखकों में कोई भी अपना विशिष्ट स्थान अभी तक नहीं सका है फिर भी लेखकों की संख्या
सौ से ज्यादा तो होगी ही, जो लगभग सभी पत्र-पत्रिकाओं में अपना एक कोना सहेजे हुए
हैं । लघु-कथा लिखना सामान्य कथा लिखने से कहीं ज्यादा कठिन है । लघु-कथा में लेखक
को कम शब्दों में ही ज्यादा बात कहने की बाध्यता रहती है इस लिए शब्दोँ और
वाक्यविन्यास का प्रभावशाली होना इसका एक अनिवार्य शर्त है । लघु-कथा लिखने के लिए
एक अलग ही प्रकार की प्रतिभा अपेक्षित है, क्योंकि लघु-कथा लिखने के लिए एक ऐसा
कथानक गढ़ना काफी मुश्किल काम होता है जो आदर्श मूल्य की स्थापना करने की क्षमता
रखता हो ।
आज के समाज में आमूल-चूल परिवर्तन हुआ है, रिश्ते परिवार
व्यक्ति और समुदाय में मनोवैज्ञानिक रूप से बदलाव देखा जा सकता है । यहाँ हर
व्यक्ति तर्कशास्त्री है जिसको उपदेश देना बिल्ली के गले में घंटी बांधने जैसा है
। इसलिए बोध-कथाओं का जो पारम्परिक स्वरूप था, समकालीन समय में उसमे काफी बदलाव
आया है, जो लघु-कथा के रूप में परिलक्षित है । आज यही लघु-कथा इन तर्कशास्त्रियों
से सीधा साक्षत्कार करती है और उन्हें सोचने के लिए मजबूर करती है ।
ऊपर हमने कहा है कि साहित्य की दुनियां में बोध-कथाएं
हाशिये पर हैं क्योंकि हिंदी के प्रमुख कथाकारों में लघु-कथा प्राय: किसी ने नहीं
लिखा है । एक परसाई जी इसके अपवाद हैं लेकिन उनकी भी लघु-कथा व्यंग्य रूप में ही हैं
। जिसको बोध-कथा कहना ठीक नहीं जान पड़ता । वैसे कुछ ऐसे लेखक हैं साहित्यिक जमघट
में जो गुमनाम से हैं वे लिख रहे हैं । कुछ ऐसे भी लेखक हैं जिन्होंने विदेशी
लघु-कथाओं का अनुवाद किया है और कर रहे हैं । आज के समय में हिंदी की व्यासायिक
पत्रिकाएं लघु-कथा बहुत छापती हैं । सारिका और नवनीत जैसी पत्रिकाएं तो लगातार
बोध-कथाएं छपती रही हैं । इनके अलावा कई छोटी-छोटी पत्रिकाएं यथा धार्मिक
पत्रिकाएं भी बोध-कथाओं को आपने पन्ने पर जगह देती रही हैं । लेकिन साहित्य की गंभीर
पत्रिकाओं में देखा जाय तो बोध-कथाओं या लघु-कथाओं को यदा-कदा ही स्थान मिल पाता
है । वह भी शायद इसलिए कि प्रमुख कहानी पत्रिका सारिका ने लघु-कथाओं का दो
विशेषांक निकालने का साहस किया जिसको पाठक वर्ग ने पसंद किया और सराहा भी । इससे प्रभावित
होकर लघु-कथा लेखकों की संख्या में वृद्धि हुई और कुछ अन्य पत्रिकाओं का भी इस तरफ
ध्यान गया ।
इस प्रकार यदि पिछले दशक में बोध- कथाओं का लेखा-जोखा
प्रस्तुत किया जाय तो हिंदी और अन्य भाषाओँ के साहित्य में भी बोध-कथाओं का व्यापक
स्तर पर पुनरुद्धार हुआ है । कुछ बोध-कथा लेखक और उनकी रचानायें यथा अशोक कौशिक
का- इंद्र का अहंकार , प्रजवत्सलता ; नारायण पंडित का- केकड़े की कहानी, कौए का
जोड़ा और काला सांप, क्षत्रिय नाइ और भिखारी , बनिया और गीदड़, बुढा बाघ और मुसाफिर ;
जगदीश चन्द्र जैन का – कोक्कास बढ़ई, चतुराई का मूल्य, दो मित्रों की कहानी ; यशपाल
जैन की- तोड़ो नहीं जोड़ो, इर्द-गिर्द, खनक, आकांक्षा (अनुदित) ; प्रमोद यादव का- आ
बैल मुझे मार ; सुकेश साहनी का- अनुताप, खरबूजा, आक्सीजन, आखिरी तारीख ; जगदीश
कश्यप का – उनका दर्द, अपकृत ; विनीत कुमार का – आमार प्रणव दा ; दीपक मशाल का –
इंतजार, इज्जत, इल्जाम जैसी अन्य बहुत से लेखकों की रचनाएँ भी समकालीन समय के अपने
दर्पण में समाज का विकृत चेहरा दिखाकर एक नया मार्ग खोजने के लिए प्रेरित कर रही
हैं ।
अंततः यही कहना चाहूँगा कि बोध-कथाएं हमेशा से ही एक आदर्श
समाज की नींव रखने का प्रयत्न करती रही हैं, और आगे भी करती रहेंगी । किन्तु आज का
समाज काफी बदला हुआ है इसलिए बोध-कथाओं में भी कथ्य, शिल्प और कथानक के स्तर बदलाव
की आवश्यकता है । हालाँकि यह काम समकालीन लघु-कथा के रूप में देखने को मिल रहा है,
फिर भी लेखकीय स्तर पर अभी भी विचार करने की आवश्यकता है । और यह तभी संभव है जब
साहित्यक पत्रिकाओं में भी इनका एक कोना सुरक्षित होगा ।
*संपर्क : महेश सिंह , शोधार्थी, हिंदी विभाग,
पांडिचेरी विश्वविद्यालय पुदुच्चेरी -६०५०१४ मोब. ७५९८६४३२५८ gguhindi@gmail.com
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