भूमंडलीकरण

      भूमंडलीकरण का चरित्र बहुआयामी है। यह अपने आपमें एक अवधारणा,प्रक्रिया और अभियान तीनो है। इसे उदारीकरण, वैश्वीकरण, बाजार-अर्थव्यवस्था, आर्थिक-सुधार उत्तर-आधुनिकतावाद विश्वग्राम इत्यादि कई नामों से जाना जाता है।यह एक ऐसी मायावी शक्ति का नाम है जो अपने विरोधियों से भी परोक्ष रूप से अपने पक्ष की बात करवा लेती है। इस संदर्भ में अभय कुमार दूबे कहना है की-“ भूमंडलीकरण एक बेहद ताकतवर परिघटना है जो सब कुछ बदल दे रही है। वह दोनों तरफ से बदलती है यानि वह हालत को अपने सार्वभौमिक सांचे में तो ढालती ही है उसके प्रति उसके विरोधियों की प्रतिक्रिया भी एक खास तरह के परिवर्तन को जन्म देती है जो शुरु में भूमंडलीकरण के खिलाफ लगता है, पर अंतिम विश्लेषण में उसकी संरचनाओं की मदद करता पाया जाता है[1] भारत जैसे अन्य विकासशील देशों तथा तीसरी दुनिया के देशों पर इसका प्रभाव प्रत्यक्ष या परोक्ष दोनों रूपों में पड़ा है। इतना ही नहीं, दुनिया के दो बड़े शक्तिशाली और साम्यवादी देश सोवियत संघ और चीन भी इसके चपेट में आने से अपने आपको नहीं बचा सके। इस प्रकार से इसने विश्व के लगभग सभी छोटे-बड़े देशों को अपना घर बना लिया है। यह मात्र आर्थिक जगत तक ही सीमित नहीं है, सामाजिक,सांस्कृतिक और राजनैतिक क्षेत्र भी इसके चपेटे मे हैं। सामान्य रूप से कहा जा सकता है कि- ‘कोई भी चीज इससे अछूती नहीं है।’
       विश्व से साम्राज्यवाद तो समाप्त हो गया लेकिन भूमंडलीकरण के कारण साम्राज्यवाद फिर से अपनी जड़ें मजबूत करने में लगा है। एक प्रकार से यह नव-आर्थिक-उपनिवेशवाद है इसकी अवधारणा और नीति यह है कि पूंजीवादी देशों का विकासशील देशों और तीसरी दुनिया के बाजारों में धाक बना रहे। हालाकि पूंजीवादी देश भूमंडलीकरण के समर्थन में यह प्रचारित करते रहे हैं कि- “पूंजीवादी देश पिछड़े देशों को विकासशील बनाना चाहते हैं। इन देशों की आर्थिक व्यवस्था और ढांचे को ग्लोबल रूप प्रदान करना चाहते हैं जिससे वे अन्तराष्ट्रीय बाजार में अपनी साख बना सकें”[2] पूंजीवादी देशों द्वारा प्रचारित यह उद्देश्य कितना भ्रामक और अस्पष्ट है प्रभा खेतान के निम्न वक्तव्यों से सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है- “इस ज्वार में सभी नावें उपर उठीं मगर इनमे से कुछ नावों में सुराख़ था जिसके कारण वे डूब गईं। कुछ छोटी नावें लहरों के बहाव में उलट गईं और कुछ नावें जो सतह पर तैरती हुई नजर आती हैं उनमें कितने आदमी बचे और कितने मरे इसका हिसाब मालूम करना मुश्किल है क्योंकि आर्थिक दुनिया में आज अस्पष्टता और जोखिम का बोलबाला है”[3] इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि- ‘भूमंडलीकरण पूंजीवादी देशों द्वारा बनाया गया एक ऐसा खेल है जिसमे खेलना तो सभी देशों को है लेकिन हर हाल में विजेता पूंजीवादी देश ही बनेंगे।       
 * भूमंडलीकरण की पृष्ठभूमि-
        भूमंडलीकरण का इतिहास बहुत पुराना नहीं है। बीसवीं शती के अंतिम दो दशकों से ही इसके लक्षण साफ तौर पर दिखाई देने लगते हैं। खासकर तब, जब विश्व के दो शक्तिशाली देशों में से एक, सोवियत संघ का विघटन हो गया। रूस के विघटन के बाद अमेरिका को चुनौती देने वाला कोई भी देश नहीं बचा था। इसलिए अमेरिका पूरी आजादी के साथ भूमंडलीकरण को प्रचारित करने में लग गया, जिससे पूरी दुनिया के पास भूमंडलीकरण के स्वागत के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा। भूमंडलीकरण के विकास को तीन चरणों में देखा जा सकता है।
        पहला चरण १८७० से १९१४ तक का है। इस समय-काल में रेलवे, टेलीग्राफ व्यस्था तथा अन्तराष्ट्रीय वित्तीय व्यस्था के आदान-प्रदान के लिए नये तौर-तरीकों और तकनीकि के साधनों का उपयोग हुआ। हस्तशिल्प और कुटीर उद्योगों को फैक्ट्रियों तक पहुँचाया जाना अपने-आप में वैज्ञानिक प्रबंध समझा गया तथा फैक्ट्रियों के संरक्षण के लिए राष्ट्रीय-राज्यों ने सेना तक की मदद ली। इस समय में रोजगार के नये मौके बने तथा पहली बार श्रम-क्षेत्र में ट्रेड-यूनियन का प्रभाव बढ़ा। एक प्रकार से यह अन्तराष्ट्रीय-करण का दौर था। दुनिया नये तरीके से अग्रसर हो रही थी तभी प्रथम विश्व-युद्ध ने सब किये-कराये पर पानी फेर दिया। इस प्रकार विश्व में एक नई भूमंडलीय संरचना बनते-बनते रह गई।
       दूसरा चरण बहुराष्ट्रीयकरण का रहा जिसका समय-काल १९५० से १९६० तक ठहरता है। १९१४ से १९५० तक के छोटे अन्तराल में वैश्विक रूप से बहुत बड़ी घटनाएँ घटीं। पहले प्रथम विश्वयुद्ध, महामंदी फिर द्वितीय विश्वयुद्ध, एक प्रकार से विश्व के लिखित इतिहास में यह सबसे बड़ी त्रासदी का समय था। जिसके परिणाम स्वरुप नव-राष्ट्रवाद का उदय हुआ और उन्नत देशों को फिर से अपने-अपने राष्ट्र के पुन:निर्माण की आवश्यकता पड़ी संभवतः इसी कारण से पश्चिमी देशों में अकथनीय आर्थिक प्रगति और समृद्धि आयी। इस बीच में अमेरिका न सिर्फ एक नयी शक्ति के रूप में उभरा बल्कि राष्ट्र के बाहर जाकर पूंजी का निवेश भी किया तथा विदेशों में अपने दफ्तर और फैक्ट्रियां खोलीं, लेकिन मुख्यालय अमेरिका में ही रखा ताकि सभी शाखाओं पर निगरानी रखी जा सके। विदेशों में अपनी फैक्ट्री स्थापित करने वाली ये कम्पनियां विशालकाय और उत्पादन तथा लाभ पर ज्यादा ध्यान देने वाली थीं। इन कम्पनियों ने अनेक देशों में अपनी फैक्ट्रियों को स्थापित किया; क्योंकि वहां मजदूरी कम थी और श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा देने की बाध्यता नहीं थी।
        द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अनेक देशों की आर्थिक स्थिति डांवाडोल हो चुकी थी ढांचागत सुविधाओं के आधार क्षतिग्रस्त हो गए। प्राकृतिक तंत्र और खाद्य सामग्री का अभाव हो गया। बमबारी में अनेक देशों के अनेक संस्थान नष्ट हो गए। महंगाई आसमान छूने लगी तथा कर्मचारियों को बेतन देने भर के पैसे सरकार के खजाने में नहीं थे। उन दिनों अमेरिका ही एक ऐसा देश था जो आर्थिक रूप से मजबूत था इसलिए अन्य पश्चिमी देशों के साथ मिलकर उसने आर्थिक पुन:निर्माण और व्यापारिक बाधाओं को समाप्त करने के उद्देश्य से चार प्रमुख अंतराष्ट्रीय संस्थाओं का गठन किया। जिससे बिना किसी अवरोध के विश्व में मुक्त व्यापार का मार्ग प्रशस्त हुआ। ये संस्थाएं – ब्रेटन वुड्स (एक्सचेंज रेट सिस्टम), अन्तराष्ट्रीय मुद्राकोष (आई.एम.एफ.-इंटरनेशनल मानेटरी फंड), विश्व बैंक, और गैट (जी.ए.टी.-जनरल एग्रीमेंट आन ट्रेड एंड टैरिफ) थीं।
       इस प्रकार से अमेरिका के नेतृत्व में बनीं इन अंतराष्ट्रीय संस्थाओं के माध्यम से भूमंडलीकरण की रुपरेखा तैयार की गई। जिससे विश्व के अनेक देशों को, जो अपने पैरों पर खड़ा हो सकने की हालत में नहीं थे, उन्हें आंशिक सहारा मिला। लेकिन इसका प्रत्यक्ष लाभ अमेरिका जैसे अमीर देशों को ही मिला। वे न केवल विश्वयुद्ध में हुए आर्थिक तबाही से बाहर निकले बल्कि विश्व में उनका आर्थिक सिक्का भी जमने लगा। इस तरह आर्थिक जगत में एक ऐसी व्यस्था पनपने लगी जिससे तीसरी दुनिया के देशों के बाजार पर अमीर और शक्तिशाली देशों का कब्ज़ा होने लगा। इसी विस्तार को अमीर और शक्तिशाली देशों द्वारा भूमंडलीकरण का नाम दिया गया।
        आज हम भूमंडलीकरण के तीसरे चरण में हैं जिसका समयकाल बीसवीं शती के आठवें दशक से अबतक  चल रहा है। लेकिन सहीं मायने में भूमंडलीकरण सोवियत संघ के विघटन के बाद से ही माना जा सकता है, क्योंकि उससे पहले विश्व दो ध्रुवों में बंटा था। एक तरफ पूंजीवादी ताकतें थीं तो दूसरी तरफ समाजवादी ताकतें। जहाँ पूंजीवादी देशों का प्रतिनिधित्व अमेरिका के हाथ में था वहीँ समाजवादी देशों का सोवियत संघ के हाथ में। इसको समझने के लिए हम अभय कुमार दूबे के वक्तव्य का जिक्र करना चाहेंगे – “ब्रेटन वुड्स समझौते के पांच साल बाद भूमंडलीकरणों के इस शीत-युद्ध ने एक नया गुल खिलाया। १९४९ में सत्तारूढ़ होने के फ़ौरन बाद चीन की कम्युनिस्ट सरकार ने अपनी डालर आमदनी को अमेरिकी सरकार की लम्बी पहुँच से बचाने के लिए पेरिस में बैंके कमर्शियाले पौर ल यूरोप डू नार्ड नामक बैंक में जमा करना शुरू कर दिया। खास बात यह थी कि इस बैंक की मिल्कियत सोवियत संघ के हाथ में थी और इसका बेतार के तार का पता था यूरो बैंक। चीनियों की देखा-देखी रूसियों ने भी अपनी डालर आमदनी या तो पेरिस के बैंक में या फिर लंदन के मास्को नरोदनी बैंक में जमा करनी शुरु कर दी। यूरोप के बैंकरों ने देखा कि उनके बैंक में एक ऐसी विपुल डालर धनराशी जमा है। जो न तो जमा करने वाले देश नियम कानूनों से नियंत्रित होती है और न ही वह ब्रेटन वुड्स प्रणाली के दायरे में आती है। वे इन उन्मुक्त डालरों का व्यापार कर सकते हैं। यही डालर पेरिस के बैंक के पते की तर्ज पर यूरो डालर कहलाये। यूरो डालर मार्केट का जन्म हुआ, जिसकी ख़ुफ़िया तो कभी खुली गतिविधियाँ, ब्रेटन वुड्स प्रणाली के नियामक अमेरिका को चिंतित करती रहीं। यह बाजार अमेरिका से भी डालरों को अपनी ओर खींच रहा था। अमेरिका ने इस प्रक्रिया को रोकने के लिए कानून तक बनाया पर उससे काम नहीं चला। साठ के दशक में जब अमेरिका में मुद्रास्फीति बढ़ी और डालर कमजोर होना शुरु हो गया तो सारी दुनिया में डालरों को सोने में भुनाने की होड़ मच गयी। अपना सोने का भंडार खाली हो जाने के डर से अगस्त १९७० में राष्ट्रपति निक्सन ने एकतरफा कार्यवाही करके डालर धारियों से यह अधिकार छीन लिया और इस तरह ब्रेटन वुड्स प्रणाली ध्वस्त हो गयी। निर्धारित विनिमय-दर के बजाय चलायमान विनिमय-दर का प्रचलन हुआ। अर्थशास्त्र की भाषा में यह मुक्त बाजार के बिना वित्तीय पूंजी के भूमंडलीकरण की शुरुआत थी।”[4]  
        इस प्रकार से रूस और अमेरिका के बीच में द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद से ही शीतयुद्ध चलता रहा। ये दोनों प्रभावशाली देश विश्व के अनेक देशों को अपने आर्थिक और राजनैतिक प्रभाव में लेने के लिए तरह-तरह के कुटनीतिक चाल चलते रहे। जिससे एक नये किस्म का उपनिवेशवाद जन्म लिया। इसको दोनों महाशक्तियो ने पसंद किया क्योंकि कुटनीतिक चालों और संबंधो के जरिये तमाम देशों को अपने प्रभाव में लाकर उनके बाजारों पर कब्ज़ा करना , सैन्य माध्यमों की कार्यवाही से कब्ज़ा करने की तुलना में कहीं अधिक आसान था। पूंजी और समाज की इस वैचारिक युद्ध में धीरे-धीरे समाज कमजोर होता गया और अंततः पूंजी ने अपना एकक्षत्र राज्य स्थापित किया। कहने का तात्पर्य यह है कि सोवियत संघ का विघटन करने में अमेरिका सफल रहा जिससे भूमंडलीकरण के तृतीय और अंतिम चरण का प्रारंभ हुआ। भारत ने भी जिसे रूस का सहयोग प्राप्त था उसके विघटन के साथ ही भूमंडलीकरण को को पूरी तरह से स्वीकार कर लिया।
 *भूमंडलीकरण का अर्थ और प्रकृति –
       प्रत्येक देश के अधिक से अधिक लोग यह सोचने लगे हैं कि वे अपने राष्ट्र में ही नहीं बल्कि विश्व-ग्राम में रह रहे हैं। लोगों में ऐसी सोच लाने का श्रेय भूमंडलीकरण का है जो की एक परोक्ष आन्दोलन की तरह है। इसे पाश्चात्य देशों द्वारा बड़े ही नियोजित ढंग से उत्पन्न किया गया। तमाम विरोधों के बावजूद इसने विश्व के अनेक देशों में परोक्ष रूप से अपना जाल बिछाया और आज भी निरंतर गतिशील है। इसी गतिशीलता के कारण आज साहित्य, समाज, राजतन्त्र, अर्थव्यवस्था, व्यापार और संरचना में भूमंडलीकरण सबके जुबान पर है। भारत में यह कोई दो दशक पहले चर्चा में नहीं था किन्तु पिछले एक दशक का इतिहास उठाकर देखें ,तो अनेक दृष्टियों से भूमंडलीकरण, केंद्र विन्दु की तरह नजर आता है। यही कारण है की भूमंडलीकरण को परिभाषित करने के लिए विशेषज्ञों में होड़ सी मची हुई है।
       कुछ विचारक इसे आर्थिक अवधारणा समझते हैं तो कुछ सांस्कृतिक आदान-प्रदान, वहीँ कुछ के लिए भूमंडलीकरण एक वृहद् सामाजिक प्रक्रिया है। कुल मिलाकर अभी भी धुंधलका छंटा नहीं है, इसके संदर्भ में 'अंधों का हाथी' नामक एक पुरानी कथा काफी हद तक प्रासंगिक लगती है।
       एंथोनी गिडेंस के अनुसार -(दि कन्सिक्वेंसेज आफ माडरनिटी) "विभिन्न लोगों और दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों के बीच में बढती हुई अन्योंन्याश्रतता या पारस्परिकता ही भूमंडलीकरण है। यह पारस्परिकता सामाजिक और आर्थिक संबंधो में होती है। इसमें समय और स्थान सिमट जाते हैं।"[5]
        हार्वे डी ने अपनी पुस्तक (दि कंडीशन आफ पोस्ट मोडरनिति -1989)में भूमंडलीकरण के संदर्भ में अपनी बात रखी है -"वैश्विकरण ,इस लिए समय और स्थान की गति और गहनता से जुड़ा हुआ है। आपका, हमारा बाजार ब्याज दर भौगोलिक गतिशीलता आदि समय और स्थान उतार-चढाव के साथ जुड़े हुए हैं। यह जुड़ाव सहज नहीं है।"[6]
      इसी प्रकार मेलकाम वाटर्स ने अपनी पुस्तक (ग्लोबलाइजेशन-1998) में भूमंडलीकरण की परिभाषा दी है -  “वैश्वीकरण एक सामाजिक प्रक्रिया है, जिसमे सामाजिक तथा सांस्कृतिक व्यवस्था पर जो भौगोलिक दबाव होते हैं, पीछे हट जाते हैं और लोग भी इस तथ्य से अवगत हो जाते हैं कि अब भूगोल की सीमाएं बेमतलब हैं।”[7]
       रोजेनाऊ (टरव्युलेंस इन वर्ल्ड पोलिटिक्स ) की परिभाषा कुछ इस तरह है –“उद्योगवाद और उत्तर-उद्योगवाद आज ऐसी वैश्वीय सामाजिक- आर्थिक और राजनितिक शक्तियां बन गई हैं जो वैश्वीकरण का पोषण करती हैं।"[8]
        उपर्युक्त परिभाषाओँ  को गहनता से विश्लेषित करने पर एक जो सबसे महत्वपूर्ण पक्ष निकलकर सामने आता है वह है ‘पूंजी’। कहने का तात्पर्य यह है कि ‘पूंजी’ भूमंडलीकरण के मूल में है जो समाज और संस्कृति को एक मंच पर लाने का प्रयत्न करता है। अब इसमें देखने वाली बात यह है कि पूंजी किस वर्ग का है तथा समाज और संस्कृति किस वर्ग की है ..? क्या यह विश्व-कल्याण और मानवता के हित में है या मात्र छलावा ही,तो इस संदर्भ में यह कहा जा सकता है कि –‘भूमंडलीकरण पूंजीपतियों की वह सोची-समझी चाल है जिसमें फंसकर आम आदमी अपनी तिजोरी की चाभी उनके हाथों में बिना कोई प्रश्न किये ही थमा देता है। यह ठीक वैसा ही है जैसे मधुमखियों के छत्ते से सीक लगाकर शहद निकाल लेना।’
      भूमंडलीकरण की प्रकृति ऐसी है कि वह राष्ट्र को राष्ट्र नहीं रहने देना चाहता बल्कि सारी भौगोलिक सीमाएं तोड़कर अन्तराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में विलय करना चाहता है। व्यक्ति को अपनी जड़ों से काटकर विश्व मानव में बदलने में विश्वास रखता है। उसकी रास्ट्रीय चेतना समाप्त कर अन्तराष्ट्रीय चेतना में बदल देता है। भूमंडलीकरण सूचना प्रौद्योगिकी के रथ पर सवार होकर राष्ट्र की सीमओं का उलंघन करता है जिससे समय और दूरी का संकुचन होता है। इसके स्वभाव में तीव्रगामिता है। इसी तीव्रता के कारण अन्तराष्ट्रीय वित्तीय प्रवाह, सांस्कृतिक प्रवाह और सामाजिक प्रवाह का निर्बाध आवागमन होता है। इसके लिए यह उपभोक्ता की सर्वोच्चता, उदारीकरण और समरुपीकरण का भ्रामक विज्ञापन करता है।वास्तव में इस विज्ञापन की आड़ में नव-उपनिवेशवाद का आक्रमण होता है। इस संदर्भ में कुमुद शर्मा का वक्तव्य देखने लायक है-बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने भूमंडलीकरण की प्रक्रिया में मनुष्य को नागरिक नहीं उपभोक्ता समझा और माल बेचने की रणनीति में उपभोक्ता को नहीं अपने व्यवसायिक हित को सर्वोपरी माना। व्यापारिक रणनीति के लिए उन्होंने विज्ञापन उद्योग का सहारा लिया। विज्ञापन के जरिये ही उसने अपने उत्पाद के लिए खरीदारों की जमात पैदा की ये कम्पनियां विज्ञापन बाजार में भारी धनराशि लगा सकती थीं। इसलिए विज्ञापन के जादू से अपने उत्पाद के हक़ में उपभोक्ता के मनोविज्ञान को बदलने में सक्षम हुईं”।[9]
     इस प्रकार आर्थिक उदारीकरण के स्वभाव को लेकर भूमंडलीकरण मूलतः पूंजीवादी शक्तियों का हित साधने में लगा रहा। वैश्विक स्तर पर प्रारंभ हुई इस भूमंडलीय प्रक्रिया ने निजीकरण को बढ़ावा देकर सरकारी हस्तक्षेप को बहुत हद तक समाप्त कर दिया। जिससे राष्ट्रीय संप्रभुता और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अनेकानेक खतरे उत्त्पन्न हुए। खासकर तीसरी दुनिया और विकासशील देशों के लिए एक नये प्रकार की चुनौती को जन्म हुआ। लेकिन एक दूसरा पक्ष यह भी है कि भूमंडलीकरण के कारण ही इन देशों को विश्वयुद्ध के त्रासदी से उठ खड़ा होने का मौका मिला। दलित, आदिवासी और स्त्री को विशेषकर लाभ हुआ। भारत और हिंदी साहित्य के संदर्भ में बात करें तो हम पाते हैं कि दलित, आदिवासी और स्त्री के आंदोलनों में तीव्रता लाने का श्रेय कहीं न कहीं भूमंडलीकरण का ही है।
      भूमंडलीकरण समरूपता की बात करता है। इसकी प्रवृति यह है कि जातीय विभेद, सांस्कृतिक वैविध्य और अन्य विविधताओं को मिटाकर एक समान संस्कृति, समान सभ्यता और समान रुचियों का ‘विश्व माडल’ तैयार हो। कहने का तात्पर्य यह है कि भूमंडलीकरण विश्व कि अनेक संस्कृतियों का एकीकरण चाहता है। परन्तु यह इसमें किस हद तक सफल होता है, यह सोचने वाली बात है। साथ ही यह भी प्रश्न उठता कि क्या वास्तव में यह विश्व का समरूपीकरण चाहता है या मात्र दिखावा है? क्योंकि भूमंडलीकरण का सबसे मूल चरित्र है बाजारीकरण, और यह सभी जानते हैं कि बाजार में संवेदना नहीं होती, यहाँ तो सिर्फ नफा-नुकसान की बात होती है। ऐसे में मुनाफे के लिए पूंजीवादी किस तरीके से किस हद तक गुजरेंगे, हम सोच भी नहीं सकते। इन्हीं प्रश्नों के संदर्भ में कुमुद शर्मा का उत्तर देखने लायक है- “मुक्त बाजार व्यवस्था में उनका समरुपीकरण वस्तुतः ‘नियंत्रीकरण है। वे समरूपता के नारे से विकासशील देशों के बाजारों को नियंत्रित कर रहे हैं। समरुपीकरण का नारा देकर सांस्कृतिक उत्पीड़न किया जा रहा है”।[10] इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि भूमंडलीकरण का यह समरुपीकरण वाला चरित्र न केवल अव्यवहारिक है बल्कि मुख्य रूप से शोषण और वर्चस्ववाद की नींव पर खड़ा है।
       भूमंडलीकरण की एक प्रवृति और है जिसे नव-उपनिवेशवाद के नाम से जाना जा सकता है। पूंजीवादी देशों के बाजार में जब अपने उत्पाद की खपत घटने लगी तब इन पूंजीवादी देशों ने उदारीकरण के नाम से विकासशील देशों के बाजार पर अपना अधिपत्य जमाना शुरु किया। एक प्रकार से यह छद्म- उपनिवेशवाद था। जिसका चरित्र; ‘दिखाने के दांत और खाने के दांत और’ जैसा है। ठीक उसी प्रकार जैसे मुह में राम बगल में छुरी। तात्पर्य यह है कि पूंजीवादी देशों ने उदारीकरण का मार्ग प्रशस्त करते हुए पूरी दुनिया को ऐसा सपना दिखाया जिसमे सभी के लिए समान अवसर की उपलब्धता थी। लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से सिर्फ और सिर्फ इसमें उनके हित की बात थी। पूंजीवादी देशों का भूमंडलीकरण के माध्यम से तीसरी दुनिया के राष्ट्रीय-राज्य सत्ता को नकारकर आर्थिक तंत्र को अपने हाथ में लेने का लक्ष्य रहा, साथ ही यह भी कोशिश रही कि स्थानीय और क्षेत्रीय संस्कृति की बागडोर भी उनके ही हाथों में रहे। यह प्रक्रिया आज भी निरंतर आगे की तरफ अग्रसर है। इसमें  वे काफी हद तक सफल भी हुए हैं। चूँकि इस प्रकार के उपनिवेशवाद में आक्रामकता नहीं होती है; इसलिए इसके विरुद्ध कोई विरोध और चुनौती भी कारगर साबित नहीं हो सकती। “इस नव-उपनिवेशवाद का स्वरूप उपर से आक्रामक नहीं दीखता इसकी आक्रामकता प्रच्छन्न है। यह आर्थिक उदारीकरण के नाम पर सीना तानकर आया है। इसलिए इसके विरुद्ध कोई अभियान या चुनौती नहीं है”।[11]
       भूमंडलीकरण की इस प्रक्रिया में स्थापित हो रहे इस नव-उपनिवेशवाद को बहुराष्ट्रीयकारण से मदद मिलता है। जिससे बहुराष्ट्रीय निगमों का वर्चस्व बढ़ा है। राष्ट्र-राज्य के राजनैतिक और सांस्कृतिक क्षेत्र में हस्तक्षेप होने से इनकी निरंकुशता भी आज जगजाहिर है। नतीजतन राष्ट्र-राज्यों का शासन भी इनके मनपसंद शासकों के हाथ में आने लगा है। यह अनायास नहीं होता, इसके पीछे राजनैतिक पार्टियों और पूंजीपतियों का आर्थिक गठजोर होना मुख्य है। अपनी-अपनी पार्टी के चुनाव प्रचार में इन पूंजीपतियों का व्यापक स्तर पर धन व्यय होता है। धन के इस व्यापक व्यय में उनका निजी स्वार्थ निहित रहता है।




[1]   अभय कुमार दूबे, भारत का भूमंडलीकरण, वाणी प्रकाशन दिल्ली, संस्करण-२००८, पृष्ठ-२७   
[2]   वी.एन. सिंह /जन्मेजय सिंह, भारत में सामाजिक आन्दोलन,रावत पब्लिकेशन,(पेपर-बैक) २००७ पृष्ठ-२९३ 
[3]   प्रभा खेतान,बाजार के बीच: बाजार के खिलाफ,वाणी प्रकाशन, २०१० पृष्ठ-११
[4]   अभय कुमार दूबे, भारत का भूमंडलीकरण,वाणी प्रकाशन- २००८, पृष्ठ-३०-३१ 
[5]  एस.एल. दोशी,आधुनिता,उत्तर-आधुनिकता एवं नव-समाजशास्त्रीय सिद्धांत,रावत पब्लिकेशन,जयपुर-२००७,पृष्ठ-३१६ 
[6]  वही, पृष्ठ- ३१७
[7]  वही, पृष्ठ- ३२२
[8]  वही, पृष्ठ- ३२२
9 कुमुद शर्मा, भूमंडलीकरण और मीडिया, ग्रन्थ अकादमी दिल्ली, २००७ पृष्ठ-२९
[10]  कुमुद शर्मा, भूमंडलीकरण और मीडिया, ग्रन्थ अकादमी दिल्ली, २००७ पृष्ठ-३३
[11]  वही, पृष्ठ- ३४ 

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